हर व्यक्ति के अन्दर एक कवि छिपा होता है. अक्सर वह बाहर निकलता है, कुछ कहता है जिसे कुछ लोग भाषाबद्ध कर लेते है, कुछ अनसुना कर देते हैं. मेरे अन्दर का कवि भी अक्सर बाहर आता है. कुछ कहता है जिसे मैं कभी भाषाबद्ध कर लेता हूँ, कभी अनसुना कर देता हूँ. आपके साथ भी ऐसा ही होता होगा. आइये कहें एक दूसरे से और सुनें एक दूसरे की.
March 25, 2008 at 2:19 pm
धन्यवाद
March 25, 2008 at 7:52 pm
स्वागतम.
आइये काव्य कुञ्ज मैं कविता कीजिये.