एक शाही चुटकुला

मार्च 27, 2008

सोनिया गाँधी – भूटान नरेश, आपने अपने देश में चुनाव करा कर एक सराहनीय काम किया है. अब आपका देश भी एक प्रजातांत्रिक देश हो गया है. इस के लिए आपको मेरी वधाई.

भूटान नरेश – महोदया आप का बहुत बहुत धन्यवाद. आपका देश तो पहले से ही एक प्रजातांत्रिक देश है, पर आप उस में प्रजातंत्र कब लागू कर रही हैं?

घुट्टी मैं मिली राजनीति

मार्च 27, 2008

नेताजी बहुत जल्दी राजनीति सीख गए,
अभी-अभी तो आए थे वह राजनीति मैं,
और अभी से बातें करने लगे पंडितों सी.

क्या कहना है आज?
और कैसे मुकर जाना है कल?
राजनीति के यह दो मुख्य दांव,
सीख लिए उन्होंने आनन फानन मैं.

पार्टी मैं हाई कमान को आज दोषी ठहराया,
कल कह दिया दोषी कोई और है,
दोनों बयानों पर तारीफ़ मिली,
हाई कमान ने तालियाँ बजाईं,
अखबारों ने मुख्य प्रष्ठ पर छापा,
चम्चो नें उनकी बलैयां लीं,
राजनीति तो घुट्टी मैं मिली है उन्हें.

और भी आए थे उनके कुछ हम उम्र,
उनके साथ राजनीति मैं,
पर वह कुछ न सीख पाये,
या सीख कर भी चुप रहे,
हिम्मत न जुटा पाये कुछ कहने की,
पार्टी और हाई कमान के बारे मैं.

धन्य हैं ऐसे नेताजी को पा कर,
हम और हमारा देश.

प्रधान मंत्री से इंटरव्यू

मार्च 27, 2008

प्रश्न – आपने दिल्ली मुख्य मंत्री की पीठ थपथपाई,
          कहा उन की बनाईं दिल्ली आपको बहुत भाई.
उत्तर – हाँ, यह तो आपने ठीक कहा भाई.

प्रश्न – साफ सुथरी, हरी भरी, अति सुंदर दिल्ली,
          देश के सब शहरों मैं प्यारी दिल्ली.
उत्तर – हाँ, यह भी आपने ठीक कहा भाई.

प्रश्न – यह किस दिल्ली की बात की आपने?
उत्तर – जहाँ मैं रहता हूँ भाई.

प्रश्न – और आम आदमी जहाँ रहते हैं,
          उस दिल्ली के बारे मैं आपकी राय,
उत्तर – मैं ऐसी किसी दिल्ली को नहीं जानता भाई.
           न ही शीला बहन ने ऐसी कोई दिल्ली दिखाई,
           कभी कभी विरोधी पक्ष करता है शिकायत,
           पर यह तो उन की आदत है भाई.

प्रश्नकर्ता – अच्छा नमस्कार.
प्रधान मंत्री – क्या इंटरव्यू ख़त्म?
प्रश्नकर्ता – जी हाँ.
प्रधान मंत्री – मैं समझा  नहीं भाई.
प्रश्नकर्ता – अगला प्रश्न तब, 
              जान जायेंगे आप जब,
              उस दिल्ली को जहाँ मैं रहता हूँ,
              दिल्ली का एक आम आदमी,
              जो नहीं है आपकी दिल्ली सी,
              साफ सुथरी, हरी भरी, अति सुंदर,
              जहाँ हमेशा रहती है विजली और पानी की किल्लत,
              जहाँ आदमी नहीं है सुरक्षित,
              न घर मैं, न घर के बाहर,
              जहाँ पुलिस से डर लगता है,
              मन कहीं और भाग जाने को करता है,
              जहाँ के वोट आपको जिताते हैं,
              पर जीत कर आप कह जाते हैं,
              मैं ऐसी किसी दिल्ली को नहीं जानता.

दो बेटियॉ भारत की

मार्च 26, 2008

दो बेटियॉ भारत की,
एक एक छोर की,
दूसरी दूसरे छोर की,
एक महान,
दूसरी सबके लिए अनजान,
एक को मिलती है टॉप सिक्योरिटी,
दूसरी को जीरो सिक्योरिटी,
पहली के बारे मैं क्या कहें?
दूसरी की कहानी सुनिए.

गरीब माँ करती है काम,
सुबह से शाम,
तब जुटा पाती है दो वक्त की रोटी,
कैसी पढ़ाई, कैसी लिखाई,
तन ढकने को पूरे कपड़े नहीं,
नोचती हैं गन्दी निगाहें,
माँ रहती है परेशान,
डर लगता है बेटी अकेली है झोपड़ी मैं,
कुछ अनहोना न हो जाए,
और एक दिन हो जाता है,
वही जिसका डर था.

घुस आते हैं झोपड़ी मैं वहशी दरिंदे,
करते हैं वलात्कार,
मार डालते हैं पीट पीट कर,
कोई नहीं सुनता उसका चीत्कार,
कोई नहीं आता बचाने को,
ख़बर छपती है अखबार मैं,
एक दिन बस एक दिन.
फ़िर दूसरी ख़बर,
एक और दूसरी बेटी की.

देश की प्रथम नागरिक महिला,
देश की कर्णधार महिला,
प्रदेश की मुखिया महिला,
और ढेर सारे कानून,
पुलिस की लम्बी कतार,
सब व्यर्थ, सब बेकार.

शास्त्र कहता है,
‘जहाँ होता है नारी का सम्मान,
वहाँ करते हैं देवता निवास’,
मनाया होगा कंचक एक दिन,
की होगी पूजा इन बेटियोँ की,
माँ, बहन, पत्नी ने,
इन वहशी दरिंदों की,
कहाँ पहुंचे हैं हम?
कहाँ पहुंचेंगे हम?

जनता का तंत्र या जनता पर तंत्र???

मार्च 26, 2008


स्पीकर महोदय ने कहा,
जनता के प्रतिनिधि कर रहे हैं ओवरटाईम,
मिटाने को जनता का तंत्र भारत मैं,
कुछ अजीब लगी मुझे यह बात,
कहाँ देखा उन्होंने जनता का तंत्र?

कहते हैं पहले गुलाम था भारत,
चलता था विदेशी राजा का तंत्र,
अब कहते हैं आजाद है भारत,
क्योंकि चलता है देश मैं जनता का तंत्र,
सब जानते हैं यह एक किताबी बात है,
ग़लत है कहना ‘जनता का तंत्र’,
सही है कहना ‘जनता पर तंत्र’,
पहले था विदेशी राजा का तंत्र,
अब है देसी राजा का तंत्र,
या कहें,
देसी बनी विदेशी रानी का तंत्र,

जनता पहले भी जनता थी,
जनता आज वही जनता है,
पिटने को, मरने को,
भूख से, गोली से,
विजली और पानी का संकट,
कमर तोड़ वढ़ती महंगाई,
घर और वाहर नहीं सुरक्षित,
जुल्म पुलिस का, महंगा न्याय,
सब जनता के लिए समर्पित.

स्पीकर महोदय ने कुछ कहना था,
स्पीकर महोदय ने कुछ कह दिया,
अखबारों ने छाप दिया,
टी वी ने दिखा दिया,
बात ख़त्म हो गई.
मेरी कविता भी ख़त्म हो गई.

एक लड़ाई अभी जारी है

मार्च 26, 2008

एक लड़ाई अभी जारी है,
कब शुरू हुई कोई नहीं जानता,
किसने शुरू की पता नहीं,
पर शायद हम सब जानते हैं,
बस अपनी जिद मैं मानते नहीं,

और यही जिद इस लड़ाई का कारण है.

यह लड़ाई शुरू हुई तब,
इंसान इस जमीन पर आया जब,
जमाने को अपना अधिकार,
किया उसने प्रकृति का बलात्कार,
हवा, पानी, सूर्य की रौशनी,
चन्दा की चांदनी, जंगल, जानवर,
नदी, नाले, पर्वत, घाटियाँ,
सब बने उस का शिकार,
मचा दिया उसने हाहाकार.

प्रकृति दर्द से कसमसाई,
सूखा पड़ा या वाढ आई,
पर्वतों ने लावा उगला,
मौसम बदले, ऋतुएं बदलीं,
सूनामी ने कहर बरपाया,
इंसान फ़िर भी समझ न पाया,
प्रकृति तो माँ है,
उससे लड़ते नहीं,
उसकी गोद मैं आराम करते हैं.

भगवान् की सबसे अच्छी रचना,
दुश्मन बन गई अपनी,
मानव स्रष्टि समाप्त होने की तैयारी है,
पर यह लड़ाई अभी भी जारी है.

प्रेम, प्यार, लव, मोहब्बत

मार्च 25, 2008

प्रेम, प्यार, लव, मोहब्बत
क्या है मतलब इन शब्दों का?

प्रेम रूप है एक ईश्वर का
प्रेम प्रभु की पूजा है,
पाना है यदि ईश्वर को तब
मार्ग नहीं कोई दूजा है.

प्रेम मार्ग पर चले चलो तुम
सब जीवों से प्रेम करो तुम,
नफरत की आंधी आए तब
प्रेम मार्ग से नहीं डिगो तुम,
उधर छोर पर प्रभु खड़े हैं
जल्दी जल्दी कदम बढ़ाओ,
जीवन का उद्देश्य यही है
प्रभु से एक रूप हो जाओ.

‘मानहु एक प्रेम का नाता’
कहा राम ने था शबरी से,
झूठे बेर प्रेम से खाए
ख़ुद चल कर उसके घर आए,
तुम भी प्रेम करो शबरी सा
मानो एक प्रेम का नाता,
जीवन प्रेम-प्रेम हो जाए
घर मैं आए जगत-विधाता.

जल और जीवन एक हैं

मार्च 25, 2008

papa_photo.jpgजल और जीवन एक हैं,
जल संचय तब जीवन संचय,
जब नभ देते जल उपहार,
नहीं संजोते, व्यर्थ गवांते,
और वाद मैं फ़िर पछताते.

जल का क्षय है जीवन का क्षय,
पानी का घटता जल स्तर,
सूखी नदियाँ, सूखी नहरें,
पानी किया प्रदूषित हमने,
हर घर मैं वीमार भरे हैं,
फ़िर भी नहीं बाज आते हम.
किसे बताएं, क्या समझायें?
सब हैं जानकार पर फ़िर भी,
अपने ही शत्रु बन बैठे,
काट रहें उस डाली को,
जिस पर बना बसेरा अपना.

तृतीय विश्व युद्ध जब होगा,
पानी उस का कारण होगा,
लिखते हैं और पढ़ते हैं हम,
एक दूजे से कहते हैं हम,
पर ख़ुद नहीं समझते हैं हम,
सर्वश्रेष्ठ रचना ईश्वर की,
मानव क्या से क्या बन बैठा,
जागो अभी समय है थोड़ा,
जल का संचय यदि करोगे,
तभी बचेगा मानव जीवन.

काव्य कुञ्ज मैं आपका स्वागत है

मार्च 25, 2008

हर व्यक्ति के अन्दर एक कवि छिपा होता है. अक्सर वह बाहर निकलता है, कुछ कहता है जिसे कुछ लोग भाषाबद्ध कर लेते है, कुछ अनसुना कर देते हैं. मेरे अन्दर का कवि भी अक्सर बाहर आता है. कुछ कहता है जिसे मैं कभी भाषाबद्ध कर लेता हूँ, कभी अनसुना कर देता हूँ. आपके साथ भी ऐसा ही होता होगा. आइये कहें एक दूसरे से और सुनें एक दूसरे की.

काव्य कुञ्ज मैं आपका स्वागत है
प्रेम करो सबसे, नफरत न करो किसी से


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